रेत का शहर
बहुत समय पहले की बात है जब science इतनी विकसित नहीं थी, तब एक बहुत दूर देश के एक राज्य में, जहां सूरज की तेज रोशनी रेत को सोने सा चमका देती थी, वहाँ का एक प्रमुख शहर, जिसका नाम ज़ौना था, इस शहर की ख़ास बात यह थी कि यह रेत के टीलों के बीचों-बीच बना हुआ था, और यहाँ की हर इमारत, हर गली, रेत के नक़्शे पर बनी थी।
लेकिन ज़ौना के लोगों की ज़िंदगी इतनी आसान नहीं थी, क्यूँकि उनके पास पानी की कमी थी। हर बूँद के लिए उन्हें लम्बा इंतज़ार करना पड़ता था, और हर दिन यह मुश्किल बढ़ती जा रही थी।
इसी शहर में, आशा नाम की एक छोटी लड़की रहती थी। आशा बहुत समझदार और जिज्ञासु थी। वो हमेशा सोचती थी कि ज़ौना को पानी की कमी से कैसे बचाया जा सकता है। उसने अपने बुजुर्गों से कई कहानियाँ सुनी थी, जिसमें एक पुरानी झील का ज़िक्र था जो रेत के नीचे कहीं छिपी हुई थी। कुछ लोग उसे सिर्फ़ एक अफ़वा मानते थे, लेकिन आशा को उस पर पूर्ण विश्वास था।
एक दिन, आशा ने फ़ैसला किया, कि वो उस झील को ढूँढेगी। उसने थोड़ा खाना, पानी , कुछ फल, और एक पुराना मिट्टी खोदने वाला औज़ार और अपने दादा-दादी से सीखे नक़्शे के कुछ टुकड़े लिए। उसका सफ़र ज़ौना शहर के सबसे बड़े रेत के टीले की तरफ़ शुरू हुआ, जिसे लोग मौत का कुआँ और टीला कहते थे, क्योंकि जो भी उस ओर गया वो वापिस लौट के कभी नहीं आया।
सफ़र बहुत मुश्किल था, तेज गरम हवाएँ और रेत उड़ती थी , उसपे सूरज की गर्मी जिस्म को झुलसा देती थी। लेकिन आशा की हिम्मत ग़ज़ब की थी, उसकी प्यास और गर्मी भरी तप्त हवाएँ भी उसका हौंसला नहीं तोड़ पाई।
आशा काफ़ी दूर आ गई थी, चलते चलते बदन में थकावट बड़ती जा रही थी, उसने कुछ देर आराम करने की सोची। जब वो थक हार कर एक जगह पे बेठ गई, तो अचानक उसे एक धीमी आवाज़ सुनाई दी ऐसा लग रहा था कि कोई धीमी सी आवाज़ ज़मीन के अंदर से आ रही है, उसने अपना औज़ार लिया और आवाज़ की उस दिशा की ओर से मिट्टी को खोदना शुरू कर दिया। घंटो की मेहनत के बाद उसे एक बहुत पुराना सा पत्थर दिखा, जिसके ऊपर अजीब से निशान बने हुए थे। ये निशान उस नक़्शे के टुकड़ों से मिलते थे जो आशा के पास था।
पत्थर को हटाने पर, उसे एक छोटी से सुरंग दिखी, आशा बिना डरे और किसी तरह की देरी किए उसमें उतर गई । सुरंग में बहुत अंधेरा था, लेकिन उसे अपने दादा दादी की वो कहानियाँ याद आई, जो कहते थे कि ज़ौना के टीलों के नीचे कई गुप्त रास्ते है, वो उस रास्ते पे चलने लगी । चलते चलते उसे एक ठंडी हवा का एहसास हुआ, जो उसके बालों से छूती हुए उसकी पसीने की बूंदो से टकराते हुए निकल रही थी, जो उसे एक ठंडक का एहसास करवा रही थी, उस ठंडी हवा का आनंद लेते हुए वो आगे की ओर बढ़ रही थी ,तभी उसे एक नीली रोशनी दिखायी देने लगी। जब वो सुरंग से बाहर निकली, तो उसकी आँखें खुली की खुली रह गयी।
उसके सामने एक विशाल, चमकती हुई झील थी!
झील का पानी इतना साफ़ और नीला था जेसे आसमान ज़मीन पे उतर आया हो।
ये वही रहस्यमयी झील थी जिसके बारे में लोगों ने कहानियाँ सुनी थी।
आशा तुरंत ज़ौना शहर की ओर वापस दौड़ी और अपने लोगों को इस खोज के बारे में बताया। शुरू में किसी ने भी आशा का विश्वास नहीं किया, परंतु जब आशा सब को उस झील तक ले गई तो सबकी आँखे फटी की फटी राह गई, झील को देख कर ख़ुशी का ठीकाना नहीं रहा। अब शहर के सबसे काबिल engineers ने झील के पानी को ज़ौना शहर तक लाने का रास्ता बनाया।
कुछ ही समय में ज़ौना शहर की क़िस्मत बदल गई। हर तरफ़ पानी था। खेत हरे भरे हो गए, हर तरफ़ ख़ुशयाली थी, पानी ही पानी था और लोगों के चेहरे की रौनक़ लौट आई। आशा ने अपनी हिम्मत और विश्वास से अपने शहर को नया जीवन दिया। अब ज़ौना शहर, रेत के शहर का राज नहीं, बल्कि पानी का शहर के नाम से जाना जाने लगा, और आशा उसकी नयी उमीद बन गयी।



